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दंतेवाड़ा में शिक्षा विभाग की गंभीर अनियमितताएं: फर्जी बी.एड. डिग्री से पदोन्नति तक, शासन को लाखों का नुकसान और जांच की मांग तेज

फर्जी बी.एड. डिग्री से पदोन्नति तक, शासन को लाखों का नुकसान और जांच की मांग तेज

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़), 19 फरवरी 2026: छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल दंतेवाड़ा जिले में शासकीय शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जो न केवल विभाग की साख पर सवाल उठाता है बल्कि शिक्षकों की योग्यता और पारदर्शिता के मुद्दे को भी उजागर करता है। शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, किरंदुल जिला दंतेवाड़ा की प्राचार्य कुं. मगरीता टोप्पो पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी तरीके से बी.एड. डिग्री हासिल की, शासन को गुमराह किया और इसके आधार पर पदोन्नति हासिल कर लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान पहुंचाया। यह मामला एक लिखित शिकायत के जरिए उजागर हुआ है, जिसमें दस्तावेजी प्रमाणों का हवाला दिया गया है। शिकायतकर्ता ने 30 जनवरी 2026 को उच्च अधिकारियों को यह पत्र भेजा, जिसके बाद जांच की मांग जोर पकड़ रही है। विभागीय अधिकारियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन स्थानीय शिक्षक संघों और नागरिकों में आक्रोश व्याप्त है।

आरोपों की जड़: आवेदन से लेकर डिग्री तक की विसंगतियां

 

शिकायत के अनुसार, यह पूरा प्रकरण 2014 से शुरू होता है। कुं.मगरिता मगरीता टोप्पो ने 14 जुलाई 2014 को मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत दंतेवाड़ा के समक्ष छत्तीसगढ़ व्यापम द्वारा आयोजित बी.एड. कोर्स (स्वयं व्यय पर) के लिए आवेदन किया। लेकिन आवेदन में ही एक बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। तत्कालीन प्राचार्य ने आवेदन को 12 जुलाई 2014 को अग्रेषित करने का उल्लेख किया, जबकि आवेदन की तारीख 14 जुलाई है। शिकायतकर्ता का दावा है कि यह छलपूर्वक हस्ताक्षर और सील प्राप्त करने का स्पष्ट मामला है। आवेदन जिला पंचायत के आवक क्रमांक 2575 पर दर्ज है, जिसकी जांच से इसकी पुष्टि हो सकती है।

 

जिला पंचायत ने 28 अगस्त 2014 को अनुमति आदेश (क्रमांक/1800/शि. (पं) स्था. जि. पं. न. क. 06/2014) जारी किया, जिसमें साफ शर्त रखी गई थी कि विश्वविद्यालयीन परीक्षा केवल स्वाध्यायी या पत्राचार माध्यम से ही दी जा सकती है। लेकिन आरोप है कि कुं. मगरिता टोप्पो ने इस शर्त की अनदेखी की और बस्तर विश्वविद्यालय, जगदलपुर से संबद्ध क्राइस्ट कॉलेज, जगदलपुर में सत्र 2014-15 के लिए नियमित छात्र के रूप में प्रवेश लिया। उनका पंजीयन क्रमांक BVA/15/00924 और रोल नंबर 67294 था, जिसके आधार पर उन्होंने बी.एड. परीक्षा उत्तीर्ण की। शिकायत में सवाल उठाया गया है कि अनुमति केवल पत्राचार कोर्स के लिए थी, तो नियमित कोर्स में प्रवेश कैसे संभव हुआ? क्या यहां विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर पर भी अनियमितता बरती गई?

 

दो जगहों पर एक साथ उपस्थिति: असंभव दावा और प्रॉक्सी की आशंका

मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कुं.मगरिता टोप्पो ने एक ही समय में दो अलग-अलग स्थानों पर उपस्थिति कैसे दर्ज कराई? किरंदुल और जगदलपुर के बीच करीब 130 किलोमीटर की दूरी है, जो दैनिक यात्रा के लिए व्यावहारिक नहीं है। शिकायत में बताया गया है कि पूरे सत्र 2014-15 के दौरान वे अपने स्कूल में नियमित रूप से ड्यूटी पर रहीं, वेतन प्राप्त करती रहीं और सभी रिकॉर्ड में उपस्थिति दर्ज है। लेकिन साथ ही क्राइस्ट कॉलेज में भी नियमित छात्र के रूप में पढ़ाई की और न्यूनतम उपस्थिति की शर्त पूरी की। विश्वविद्यालय नियमों के मुताबिक, बी.एड. कोर्स में कम से कम 80% उपस्थिति अनिवार्य होती है। यदि वे स्कूल में ड्यूटी कर रही थीं, तो कॉलेज में उपस्थिति कैसे दर्ज हुई? शिकायतकर्ता ने प्रॉक्सी (किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उपस्थिति) की संभावना जताई है, जो आपराधिक कदाचार की श्रेणी में आता है।

यदि उन्होंने अध्ययन अवकाश नहीं लिया और पूरे सत्र का वेतन लिया, तो यह शासकीय धन का दुरुपयोग है। अनुमान है कि इस में लाखों रुपये का वेतन अनुचित रूप से प्राप्त किया गया, जो शासन को सीधा आर्थिक नुकसान पहुंचाता है। शिकायत में मांग की गई है कि स्कूल की उपस्थिति पंजी, कॉलेज के रिकॉर्ड और वेतन भुगतान की गहन जांच होनी चाहिए।

सेवा पुस्तिका में फर्जीवाड़ा और जांच में लापरवाही

आरोपों का एक और पहलू सेवा पुस्तिका से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, स्वाध्यायी/पत्राचार की अनुमति के बावजूद नियमित बी.एड. डिग्री को कुं.मगरिता टोप्पो की सेवा पुस्तिका में दर्ज कर लिया गया। इसी आधार पर वे प्राचार्य पद पर पदोन्नत हुईं। यह स्पष्ट उल्लंघन है, क्योंकि पदोन्नति के लिए योग्यता की जांच में इस गड़बड़ी को नजरअंदाज किया गया। 5 जनवरी 2026 को जिला शिक्षा कार्यालय द्वारा की गई जांच में सत्र 2014-15 की उपस्थिति पंजी को जब्त नहीं किया गया, जबकि सूत्रों से पता चला है कि कुं. मगरिता टोप्पो ने इसे विरूपित (बदलाव) कर दिया है। यह जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाता है।

शिकायत में यह भी उल्लेख है कि जिला स्तर पर पहले भी कई शिकायतें की गईं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। कुं. मगरिता टोप्पो का कथित बयान है कि उनकी बहन लोक शिक्षण संचालनालय में पदस्थ है और एक रिश्तेदार राज्य प्रशासनिक सेवा में उच्च पद पर है, इसलिए कोई शिकायत व्यर्थ है। यह राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण की ओर इशारा करता है, जो विभागीय अनियमितताओं को बढ़ावा देता है।

विभागीय प्रतिक्रिया और जांच की प्रक्रिया

शिकायत के संदर्भ में जिला शिक्षा अधिकारी ने 16 दिसंबर 2025 को पत्र क्रमांक/3752/स्था. 01/जि.शि.अ./2025 जारी किया, जिसमें कुं.मगरिता टोप्पो के संबंध में प्राप्त शिकायत का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि जांच हेतु एक कमेटी 5 जनवरी 2026 को संस्था में उपस्थित होगी और संबंधित व्यक्ति को उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन शिकायतकर्ता का कहना है कि जांच अधर में लटकी हुई है और इसमें लापरवाही बरती जा रही है। अभी तक कोई अंतिम रिपोर्ट नहीं आई है, जिससे संदेह और गहरा हो रहा है।

शिकायतकर्ता की मांगें और व्यापक प्रभाव ने अपनी शिकायत में प्रमुख मांगें रखी हैं:

पूर्ण जांच से यह तय किया जाए कि बी.एड. डिग्री गलत तरीके से प्राप्त हुई या शासन को आर्थिक हानि पहुंचाई गई।

अनुमति शर्तों के विपरीत प्राप्त डिग्री को सेवा पुस्तिका से हटाया जाए और पदोन्नति आदेश निरस्त किया जाए।

दोषी के खिलाफ उचित विधिक कार्रवाई की जाए, ताकि यह अन्य शिक्षकों के लिए उदाहरण बने और ऐसी घटनाएं रोकी जा सकें।

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में शिक्षा विभाग में फर्जी डिग्री और अनियमितताओं के मामले बढ़ रहे हैं। हाल के वर्षों में मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में फर्जी बी.एड./डी.एड. डिग्री के आधार पर नौकरी करने वाले सैकड़ों शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई हुई है, जिसमें निलंबन, वेतन वसूली और जेल की सजा शामिल है। जांच एजेंसियां आमतौर पर उपस्थिति रजिस्टर, प्रवेश रिकॉर्ड, विश्वविद्यालय दस्तावेज और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच करती हैं। दंतेवाड़ा का यह प्रकरण यदि सत्य साबित होता है, तो आदिवासी इलाकों में शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा, जहां शिक्षकों की कमी पहले से ही एक समस्या है।

स्थानीय निवासियों और शिक्षक संगठनों का कहना है कि ऐसे मामलों से योग्य शिक्षकों का मनोबल गिरता है और फर्जीवाड़ा करने वालों को बढ़ावा मिलता है। जांच की मांग अब उच्च स्तर पर पहुंच गई है, और उम्मीद है कि राज्य सरकार या लोकायुक्त इसकी गहन जांच कराएगी। यदि दोष सिद्ध होता है, तो यह छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग के लिए एक बड़ा सबक होगा, जो पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाने को मजबूर करेगा। मामला अभी विकासशील है, और आगे की जांच से और भी खुलासे होने की संभावना है।

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